सोमवार, 4 जुलाई 2011

भीड़ में भी अलग- (एस.एम् हबीब)



एस.एम् हबीब से मेरी मुख्य पहचान हुई द्रौपदी के माध्यम से ... जी हाँ द्रौपदी - जिसे संगीता स्वरुप जी ने प्रासंगिक तौर पर उठाया , मैंने द्रौपदी को आधार बनाया एस.एम्.हबीब ने द्रौपदी के प्रश्नों का उत्तर दिया - http://urvija.parikalpnaa.com/2011/05/blog-post_6242.html
और इसके बाद गहराई से मैंने इनको पढ़ना शुरू किया और जाना उनको उनके ही शब्दों में - ज़मीरे खुद में देखा, फ़क़त तारीको खलाश है. खुद को न पा सका, मुझे अपनी ही तलाश है.
मैं और प्रभावित हुई जब मैंने पढ़ा -
एक बुनियादी फर्क होता है
इंसान और पत्थर में,
चेतनता और जड़ता का...
किन्तु दोनों में
एक विचित्र संयोग भी देखा मैंने-
"लहू बहाते वक़्त अक्सर पत्थर हो जता है इंसान!!!" सूक्ष्म विचारों के बीच से जो गुजरता है , वह भीड़ में भी अलग होता है !

भीड़ में होकर भी भीड़ से अलग एस.एम्.हबीब को जानें उनके द्वारा -

नाम - एस. एम्. हबीब (संजय मिश्रा 'हबीब')
जन्म - १४ जुलाई १९६५
जन्मस्थान - रायपुर छत्तीसगढ़
पिताजी - स्व. गोपाल चन्द्र मिश्रा
शिक्षा - स्नातक
कार्यक्षेत्र - (शासकीय) नेत्र सहायक अधिकारी रायपुर छत्तीसगढ़
प्रकाशन - कलरव (संयुक्त काव्य संग्रह)
- स्थानीय पत्र पत्रिकाओं में कवितायें, कहानी, व्यंग्य प्रकाशित.
- (कुछ किताबों में आवरण निर्माण और रेखाचित्र)
सम्पादन - 'ब्रह्मास्त्र - १०' (सामाजिक पत्रिका)
पुरस्कार - "साहित्य प्रहरी पुरस्कार - 2010" (चेतना साहित्य एवं कला परिषद् छ. ग.)
रूचि - पठन, लेखन, चित्रकारी.
पता - ३०/५१८, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी प्रतिमा के पीछे, आजाद चौक रायपुर छत्तीसगढ़.
४९२००१. फोन - ०७७१-४०१०८०८ | ९३२९५८०८०३ | ९४०६३८०८०३

घर में सभी को पुस्तकों से बड़ा लगाव रहा. बचपन से ही दादा जी को पढ़ते देखा. उनके पास संस्कृत, हिंदी, उर्दू, बांग्ला, गुजराती, उडिया आदि भिन्न भिन्न भाषाओं की जाने कितनी किताबें थीं. उनका इन सभी भाषाओं पर कमाल की पकड़ थी. उनसे ही मुझे उर्दू का कायदा, और बांग्ला भाषा का प्रारंभिक ज्ञान मिला और एनी भाषाओं के प्रति जिज्ञासा भी जागी. मैनें एक बार उनसे उत्सुकतावश पूछता "बाबा, आपने कोई किबाब नहीं लिखी?" वे हंस कर एकदम सादगी से बोले "नहीं रे... दुनिया में इतनी सारी किताबें हैं पढने के लिए, इतनी चीज़ें हैं सीखने के लिए कि वक़्त ही नहीं बचता कुछ लिखूं..." और उन्होंने मुझे एक किताब दी. अनिल बर्वे की "थेंक यु मि. ग्लाड" देशभक्ति और मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण इस प्रहसन ने जैसे विशाल साहित्य जगत का द्वार मेरे लिए खोल दिया... दादा जी की प्रेरणा से जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, फनीश्वरनाथ रेनू, आचार्य चतुरसेन शाष्त्री, कालिदास, महादेवी वर्मा, निराला, पन्त, बच्चन, धर्मवीर भारती, अमृता प्रीतम, सहित टालस्टाय, गोर्की, मोपांसा, एंटन चेखव इत्यादि कालजयी रचनाकारों की किताबों से गहरी मित्रता हो गयी... आज भी ये मेरे अभिन्न मित्र हैं और मेरा संबल भी.... इनकी उंगली थामे चलते हुए ग्रेजुएसन के बाद कुछ वक़्त हाई स्कूल में अध्यापन कार्य किया साथ ही कुछ समाचार पत्रों में कार्य करते हुए नेत्र विज्ञान में डिप्लोमा की और वर्तमान में शासकीय चिकित्सालय में कार्यरत हूँ. बहुत ज्यादा लेखन नहीं किया है. कभी अंतर में भावों का दरिया फूट पड़ता है तो रचनाओं के रूप में संकलित कर लेता हूँ. चेतना साहित्य एवं कला परिषद् द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह 'कलरव' में छत्तीसगढ़ प्रदेश के छः प्रतिष्टित कवियों की रचनाओं के साथ मेरी १० कवितायें संकलित हैं का विमोचन अभी हाल में संपन्न हुआ है. आतंकवाद पर लिखी अपनी एक कहानी "अतीत" का नन्हा पात्र 'हबीब' अनायास मेरे नाम के साथ चलने लगा.... इस कथा के एक संवाद " कि हबीब, तू अपने नाम की तरह सारी खिलकत का दोस्त बनना" के सादे व सहज अर्थ को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करता हूँ....

मुझसे मिलें - http://smhabib1408.blogspot.com/

13 टिप्‍पणियां:

  1. "लहू बहाते वक़्त अक्सर पत्थर हो जता है इंसान!!!" सूक्ष्म विचारों के बीच से जो गुजरता है , वह भीड़ में भी अलग होता है !

    बहुत असर छोड़ गए ये लफ्ज़ ....
    रश्मि दी आपके द्वारा श्री एस .एम् .हबीब जी का परिचय पाना बहुत अच्छा लगा |
    सुदृढ़ लेखन है ..!!
    रश्मि दी आभार आपका ...
    हबीब जी आपको शुभकामनायें ....

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  2. हबीब जी का परिचय पाकर अच्छा लगा कभी कभी पढते हैं इनका ब्लोग । आभार आपने विस्तृत परिचय करा दिया।

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  3. Parichay karane ke liye dhanyabad di.

    Meri bhawnaye me kux bhi nahi mil raha hi padhne ko Kyo?

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  4. हबीब साहब से परिचय कराने के लिए बहुत धन्यवाद.

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  5. आदरणीय रश्मि दी,
    सादर नमस्कार....
    आद. रमानाथ अवस्थी जी कि ये पंक्तियाँ मुझे बेहद प्रिय है...
    भीड़ में भी रहता हूँ वीरान के सहारे
    जैसे कोई मंदिर किसी गाँव के किनारे...
    आपकी कलम से इसी रूप में अपना परिचय पढ़ा.... सच कहूं दी, निश्चित रूप से आप मुझे, मुझसे भी ज्यादा जानती हैं.... आभार....
    आपसे और सभी सम्माननीय शुभचिंतकों से अपना स्नेह ओर मार्गदर्शन बनाए बनाए रखने का सादर अनुरोध....
    सादर....

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  6. संजय मिश्रा ...पहली बार पूरा नाम जाना ... मैं कब से इनके लेखन को पधन लगी ..याद नहीं ..पर जब भी मेरी किसी रचना पर टिप्पणी दी हमेशा एक अपनेपन का एहसास हुआ ... आज यहाँ पूरा परिचय जानने का अवसर मिला ..अच्छा लगा ... शुभकामनायें ..और
    रश्मि जी आपका आभार ..

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  7. आपके शब्‍दों में संजय जी को जानने का सौभाग्‍य आज प्राप्‍त हुआ ...बहुत ही गहन विचारों के साथ आपका सशक्‍त लेखन पढ़कर अच्‍छा लगा,
    भीड़ में भी रहता हूँ वीरान के सहारे
    जैसे कोई मंदिर किसी गाँव के किनारे...
    आभार के साथ शुभकामनाएं ।

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  8. परिचय कराने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद......!!

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  9. Achha laga padh kar. Kavya bhav bhare hn aur atm manthan ke liye prernadayak prasang chhipe hn. Dhanyavad.

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  10. हबीब भाई से परिचय कराने के लिए आपका धन्‍यवाद.

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  11. एक बुनियादी फर्क होता है
    इंसान और पत्थर में,
    चेतनता और जड़ता का...
    किन्तु दोनों में
    एक विचित्र संयोग भी देखा मैंने-
    "लहू बहाते वक़्त अक्सर पत्थर हो जता है इंसान!!!"
    मैंने अपने ब्लॉग पर गोधरा कांड के ऊपर 'गुजरात' नाम से एक कविता लिखी है , लेकिन न जाने क्यूँ मुझे हमेशा ऐसा लगता था कि कुछ कमी है अभी भी इसमें , शायद ये ही वो पंक्तियाँ हैं , जिन्हें मैं कहना चाहता था |
    हबीब भैया आपको और रश्मि mam आपको भी बहुत बहुत धन्यवाद |

    सादर

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