शनिवार, 9 जुलाई 2011

शांत नदी सी - (शोभना चौरे)



वेदना तो हूँ पर संवेदना नहीं, सह तो हूँ पर अनुभूति नहीं, मौजूद तो हूँ पर एहसास नहीं, ज़िन्दगी तो हूँ पर जिंदादिल नहीं, मनुष्य तो हूँ पर मनुष्यता नहीं , विचार तो हूँ पर अभिव्यक्ति नहीं|... ये पंक्तियाँ हैं 'अभिव्यक्ति' की मालिकन शोभना चौरे जी की . मैंने शोभना जी को जब भी पढ़ा , वे मुझे एक शांत नदी सी लगी , जिसकी हर लहरों में जीवन के विविध संगीत होते हैं ! मेरे ब्लॉग के शुरूआती दौर में वे नियमित रूप से लिखती रहीं . मैंने जब 'अनमोल संचयन ' का संपादन किया तो शोभना जी भी उसका एक अंश बनीं , तात्पर्य कि उनकी रचना भी इस संग्रह में है . रचनाओं के मध्य मेरा उनका सम्मान का संबंध बना - वे मेरा सम्मान करती हैं, मैं उनका सम्मान करती हूँ .

अब पकड़ते हैं परिचयात्मक सूत्र शोभना जी के शब्दों में -

मेरा जन्म सन १९५४ में खंडवा (मध्य प्रदेश )में ऐसे परिवार में हुआ जहां पर लडकियो को कभी बोझ नही समझा |बहुत हि लाड प्यार से चार बहने होते हुये भी सम्पन्न सम्मिलित परिवार में लालन पालन हुआ |शिक्षा खंडवा में ही हुई |लाड प्यार से पालन जरूर हुआ कितु पिताजी बहुत सी बातो में सख्त | सरकारी पाठशालाओ में सम्पूर्ण शिक्षा | जिस महाविधालय मे पिताजी व्याख्याता थे सुविधाये मिलने के बावजूद भी कन्या महाविद्यालय में ही बड़ी मिन्नतो के बाद प्रवेश लेकर
बी.ए .तक शिक्षा |पढाई से ज्यादा कालेज की अन्य गतिविधियों में ज्यादा सक्रियता |और कालेज में आजीवन कुवारी रहने वाली प्रिंसिपल मेडम के सखत कानून जिन्होंने आत्मविश्वास प्रदान किया | औरे हर गलत बात का विरोध किया फलस्वरूप बहुत झिडकिया खाई है |
इन सब के बीच बड़ी मुश्किल से मिली एक डायरी में छोटी मोती कविताये या लेख लिखकर रख लेती एक बार पिताजी को हिम्मत कर डायरी बताई तो उन्होंने कहा "अब सब कवी ही हो गये क्या ?"तब से वो डायरी इतिहास बन गई |घर के कार्य करना और चोरी चोरी रेडियो सीलोन सुनना (क्योकि सिर्फ आकाशवाणी इंदौर और समाचार सुनना ही रेडियो का काम था )अच्छा लगता साहित्यिक किताबे जो तब समझ में नहीं आती थी उन्हें पढना |
कालेज खत्म होते ही शादी| शादी गाँव में हुई पर पति मुंबई में निजी कम्पनी में इंजिनियर तो एक महिना गाँव में बिताकर मुंबई की राह पर बहुत सारे सपने लेकर सपनो के शहर में |यहाँ भी काकी सास का सख्त कानून सारे सपने सपने ही रहे रहते अलग थे किन्तु मलाड और गोरेगांव के बीच की दूरी आतंक के लिए काफी थी |
आठ साल के देवर को पढ़ने की जिम्मेवारी थी मेरी परिवार में अघोषित नियम था जो पढ़ चुका है उसे आगे की पीढ़ी की जिमेवारी लेनी ही है |अपने भी दो बेटे हो गये |मुंबई के खर्चे बाहर जाकर काम भी नहीं किया जा सकता था \तब सिलाई का काम शुरू किया घर में ही|साथ ही महिला मंडल की सदस्य बनकर उन दिनों म्रणाल गोरे के साथ मिलकर बस्तियों में पढ़ाने का काम भी किया वही के बच्चो के कपड़े ,महिलाओ के कपड़े न्यूनतम शुल्क लेकर सिये |खूब संस्कृतिक गतिविधियों में भी भाग लिया और काकीजी को भी अपने अनुसार ढाल लिया तब काम आसान हो गया |मुंबई में १५ साल बिताने के बाद नोकरी के चलते विकरम सीमेंट( नीमच म प्र.)में आ गये |
यहाँ पर महिला मंडल के सोजन्य से गाँवो में काम करने का अवसर मिला जो मेरी दिली तमन्ना थी १० साल तक खूब काम किया |नेत्र शिविर ,परिवार नियोजन शिविर ,पोलियो शिविर ,महिलाओ को सिलाई सीखन,प्राथमिक स्कूल खोलना ,और सबसे बड़ा काम कारपेट बनाना बुनकर महिलाओ जिनका काम बंद हो चुका था उन्हें ट्रेनिग देकर काम सिखाना जो आज भी चल रहा है |वो मेरे जीवन का स्वर्णिम युग था |
इस बीच सन १९८९ में कविताओ की डायरी खुली |नै कविताये लिखी कुछ लेख धर्मयुग ,वामा सरिता में छपे भी दैनिक अख़बार में भी फिर इन सामाजिक कार्यो और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते फिर लिखना बंद हो गया २००८ में जब ब्लॉग के जरिये फिर लिखना शुरू किया सबका स्नेह पाकर भावनाएं चल पड़ी की बोर्ड के सहारे |
बहुत खूबसूरत जिन्दगी जी है सामाजिक व्यवस्थाओ से रिश्तो से शिकायत तो रहती ही है किन्तु कबीर की वाणी
बुरा जो देखन मै चला बुरा न मिलिया कोय
जो दिल देखा अपना मुझसे बुरा न कोय |
सारी कुंठाओ को मिटा देती है और एक नई उर्जा भर देती है जीवन में |
ब्लागिग ने भी बहुत कुछ दिया है पर पोते निमांश २ साल की बाल लीलाओ में अभी ब्लाग को कुछ नहीं दे पा रही हूँ |
प्रकाशित पुस्तक काव्य संग्रह -शब्द भाव , ... इसके साथ साथ मैं हूँ - 'अनमोल संचयन' एवं 'अनुगूँज' में ...

15 टिप्‍पणियां:

  1. ्शोभना जी से पहला परिचय उनकी मेल से हुआ उसके बाद उनकी किताब से…………वैसे तो मै ब्लोग पढती ही थी मगर उनके दिल के भावो को मैने उनकी किताब के जरिये जी जाना और उसके बारे मे चर्चा मंच पर भी चर्चा की…………आज उनका पूरा परिचय पाकर और भी अच्छा लगा…………आभार्।

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  2. Sach kaha aapne Shobhna Ji...
    बुरा जो देखन मै चला बुरा न मिलिया कोय, जो दिल देखा अपना मुझसे बुरा न कोय |
    सारी कुंठाओ को मिटा देती है और एक नई उर्जा भर देती है जीवन में |
    Aapse shayad ek baar baat hui thi Anmol Sanchayan ke waqt...Accha laga aaj aapko jaanna...!

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  3. शोभना जी के बारे में जानकार बहुत अच्छा लगा..

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  4. बहुत ही सशक्त परिचय.... बहुत बहुत धन्यवाद....

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  5. शोभना जी के बारे में जानकार बहुत अच्छा लगा.....

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  6. शोभना जी के बारे मैं पढ़ कर बेहद ख़ुशी हुई

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  7. इस परिचय से शोभना जी की शोभा में और इजाफा हुआ।

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  8. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (11-7-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  9. आप तो "गागर में सागर" हैं आप की हिम्मत व् कर्मठता की जितनी सराहना की जाए वो कम ही होगी .आपकी लेखनी को भी नमन .

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  10. रेडिओ सीलोन को सुनने के लिए क्या क्या जातां नहीं करने पड़ते रहे होंगे, समझ सकती हूँ ..
    सुलझी लेखनी है शोभना जी की , वे स्वयं भी सुलझी हुई हैं !
    आभार !

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  11. आपकी कलम और शोभना जी का परिचय ...अच्‍छा लगा उनके बारे में जानकर ..आपका बहुत - बहुत आभार ।

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  12. रश्मिजी
    बहुत बहुत धन्यवाद मेरा परिचय करवाने के लिए |
    आप सभी का हार्दिक धन्यवाद मुझे पढने और और समझने के लिए |

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  13. waha bahut khub..yaha shobna ji ko padhna bahut accha laga....aap aise hi parichay karwati rahe..aabhar

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  14. एक साधारण गृहणी का असाधारण सफर , काबिल-ए-तारीफ|

    सादर

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