सोमवार, 11 जुलाई 2011

वो कहते हैं ' पिक्चर अभी बाकी है दोस्त' - रश्मि प्रभा की



क्या रह गया ? वह आवरण जो उस लड़की के चेहरे पर धूप छाँही का खेल खेलता है , या वह जो उसके पहनावे से बता देता है कि वह जो दिखा रही है , वैसी है नहीं या वह जो मेरे शब्दों में सर पटकता है !
तो .... बताओ बंधु , ख़ुशी और दर्द को पूरा शरीर मिलता कहाँ है ! जब तक ख़ुशी की आकृति बनाओ , दर्द आकर उसे अपाहिज बना देता है, जब तक दर्द को रेखांकित करो, ख़ुशी आकर उससे पंगे लेती है . बहुत मुश्किल है इन दोनों को हुबहू उतारना !
चलिए एक प्रयास और सही - छोटी सी वह मिन्नी १३ फरवरी १९५८ को डुमरा (सीतामढ़ी) में जन्मी . तब वहाँ बिजली नहीं थी, यानि बिजली का कनेक्शन नहीं - जन्म के साथ बिजली का आना - शायद तय था मेरे नाम का होना 'रश्मि'.
मुझसे बड़ी तीन बहनें , एक भईया यानि मैं चौथी बेटी थी .... पापा नहीं हुए थे मायूस ना अम्मा , पर लोगों ने धीरे से निराशा व्यक्त की थी - बेटी हुई फिर ! इससे जुडी एक कहानी सुनाती हूँ - एक दिन हम सब बैठे थे , मैं ६ ७ साल की थी , स्कूल में चपरासी थे - चुल्हाई भाई, हाँ हम उनको भाई कहते , शुरू से इसी तरह हम किसी काम करनेवाले को बुलाते थे . हाँ तो चुल्हाई भाई ने बताना शुरू किया - " जब मुन्नू बबुआ हुए तो साहेब के पास जैकारी बाबा आए , साहेब उनको पूरा सीतामढ़ी, डुमरा में मिठाई बांटने का पैसा दिए ..." मैं तन्मयता से सुन रही थी और अपनी बारी की प्रतीक्षा में थी .... बड़े उत्साह से मैंने पूछा - ' और चुल्हाई भाई , हम हुए तो ...' ओह , बहुत ही खराब ढंग से चुल्हाई भाई ने कहा , ' तुम्हारे आने की खबर सुनते सब दुःख से सो गए ' , मैं तो फफक के रो पड़ी ... शाम में जब पापा आए तो मैंने पूछा - ' पापा हम हुए तो सब सो गए थे दुःख से ?' पापा ने बड़े प्यार से कहा - ' ना बेटा , हम जाग रहे थे '.... मैं तो खुश हो गई, पर कुछ बाहरी बड़ों ने चिढाया - ' उनको चिंता से नींद कहाँ आनेवाली थी !' .... ये चिंतावाली बात उस उम्र में समझ में भी नहीं आई . हम ४ बहनें , एक भईया .... कभी कोई फर्क होते हमने नहीं देखा .
मैं तो यूँ भी पापा के शब्दों में रिकॉर्ड प्लेयर थी .... बोलती थी तो बस बोलती जाती थी, गाती थी तो बस.......कोई हमारे घर आता ,पापा अम्मा जब तक नहीं आते , मैं पूछती - 'गाना सुनेंगे ?' जवाब मिले बगैर चालू .... आधे अधूरे जितने गाने याद होते वो सुनाकर हहाहाहा उनका मन लगाते !

धीरे धीरे दीदी भईया लोगों की शादी हो गई .... १९७९ में भईया की शादी हुई . मेरे लिए पापा हमेशा कहते - 'इतनी धूमधाम से शादी होगी कि सब दाँतों तले ऊँगली दबायेंगे ' और मैं ! मुझे तो पलक झपकते पंख लगाकर उड़ने की आदत थी, तो कई उड़ानें भरती . पर पलक झपकते यथार्थ की धरती पर ...................पापा नहीं रहे ....(१९८०) आनन् फानन में बहुत सारे दृश्य बदल गए . जब दृश्य बदलते हैं तो बदलते ही चले जाते हैं , तो बदलते ही गए . .... शादी हुई, बच्चे मेरी ज़िन्दगी बने .......... और ज़िन्दगी को बनाने में मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी तो फिर ज़िन्दगी ने भी मुझे कसकर गले लगाया और ... उसीका करिश्मा है कि आज मैं आपके सामने हूँ और मैं जो लिखूं , आप सबकी ऊँगली नहीं छोडती . मैं बनाना चाहती हूँ एक साहित्यिक संसार , जिसे लोग याद करें .... जैसे हम याद करते हैं - महादेवी, पन्त, बच्चन, निराला , टैगोर, प्रसाद, शरतचंद्र , अज्ञेय , दिनकर ............और इनके जैसे कई विलक्षण रचनाकारों को .

अब तो नहीं है न बाकी कुछ ?

26 टिप्‍पणियां:

  1. सच जिन्‍दगी ने आपको कसकर गले लगाया ..तभी तो यह जादू है शब्‍दों में जो इन्‍हें पढ़ता है और सुनता है वह बस आपका हो जाता है हां उसके रूप कुछ भी हो कभी दोस्‍त तो कभी दीदी तो कभी मां कुछ बेनाम रिश्‍तों के साथ जुड़ ही जाते हैं आपके साथ ...यह कारवां यूं ही आगे चलता रहे ..अच्‍छा लगा इन बातों को जानकर ..।

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  2. आप आप ही हैं .बहुत बहुत अच्छा लगा आपके बारे में जान कर

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  3. वाह ..आज तो आप हैं यहां ..सच हम भी यही चाहते हैं हमारी उंगली आप हमेशा थामकर रखें क्‍योंकि आपसे दूर होना ही नहीं चाहते हम ..आपको पढ़ना और सुनना दोनो अच्‍छा लगता है वह आपका समय वाला रूप याद आता है परिकल्‍पना पर .. फिर आपकी हर रचना एक संदेश लेकर आती है हम नये लोगो के लिये ..आपका साहित्यिक संसार जिसे सब याद करें बस चुका है ...मेरी भावनाएं के रूप में ...शुभकामनाओं के साथ, फिर आती हूं ... ।

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  4. didi aapko or aapki is lekhni ko naman....aap jo likhti hai dil ko chu leti hai...aaj ek bar phir se aapko padhna bahut accha laga......aabhar

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  5. आपसे इस अन्दाज़ मे मिलकर बहुत अच्छा लगा।

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  6. जिंदगी के कई दौर गुजर जाते हैं . जो कर रहे हैं यदि उससे संतुष्टि है तो मन शांत रहता है . लिखते रहिये . शुभकामनायें .

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  7. कुछ और बातें जान कर बहुत अच्छा लगा ... ...आपमें जो लगन है ....आपको आगे बढ़ने से कोई रोक ही नहीं सकता ...

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  8. मैं बनाना चाहती हूँ एक साहित्यिक संसार , जिसे लोग याद करें .... जैसे हम याद करते हैं - महादेवी, पन्त, बच्चन, निराला , टैगोर, प्रसाद, शरतचंद्र , अज्ञेय , दिनकर ............और इनके जैसे कई विलक्षण रचनाकारों को .


    aamin mausi...jaroor hoga,,,,

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  9. मेरे पास शब्द नही है कुछ भी कहने के लिए.. सिर्फ एक शब्द "Incredible personality" जो आपको explain करता है.... than u for everything....

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  10. रश्मि जी, आप का लिखने का अन्दाज़ और भावनाओं की अभिव्यक्ति बहुत सुन्दर है. ऐसे ही आप बीती से जग बीती तक साहित्य सृजन की शुभकामनाएँ

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  11. जिंदगी को गले लगाना, लगना ही था जरुरी ...
    साहित्य संसार बनाने की आपकी मंशा जरुर पूर्ण होगी , हो रही है ...
    शुभकामनायें !

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  12. पिक्चर भले ही खत्म हो जाये पर उसका अंत नहीं होता ... तो पिक्चर तो अभी भी बाकी है दोस्त :):) ज़िंदगी को ऐसे ही कस कर गले लगाये रहिये ... और हम आपकी एक उंगली थामें साथ साथ चलते रहेंगे :):)

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  13. दी ,आप ऐसी ही रहना .......इतनी ही प्यारी और हम सब पर दुलार बरसाती ....... सादर !

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  14. नहीं जी लगता है फिर आपने कुछ बाकी रख लिया। कोई बात नहीं। फिर कभी सही ।

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  15. यही तो समाज की विसंगति थी अपने समाज की जो अब भी बड़ी मात्रा में मौजूद है। मुझे आज भी याद है कि कैसे बेटी के जन्म पर मेरी चाची फूट फूट कर रोयी थी। पर समाजिक बुराई के लिए हम भी तो जिम्मेवार है?

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  16. आप का ये अंदाज़ भी अच्छा लगा...येसे ही मुस्कराती रहे...

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  17. देर से आना हुआ पर भीनी -भीनी खुशबू बरकरार है |
    आपकी इस श्रेष्ठ मनोकामना के लिए अनेकानेक शुभकामनाये |

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  18. fir ek baar jana aapko
    aaj kuchh samajh bhi aaya aapki rachnaon mein jo ek alag si baat hai kyun hai

    bas dil khush ho gaya padh kar

    abhar

    Naaz

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  19. सच हम भी यही चाहते हैं आप हमेशा हमारे साथ रहें क्‍योंकि आपसे दूर होना ही नहीं चाहते हम ..आपको पढ़ना इतना अच्‍छा लगता है की हम इसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते .. आपकी हर रचना एक संदेश होती है हमारे लिये ..आपका सुन्दर सा साहित्यिक संसार हमारे सामने है ... हम सब की असीम शुभकामनायें आपके साथ हैं...

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  20. रस्मी जी आपके करिश्माई शब्दों में आपका परिचय अच्छा लगा आभार

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  21. मैं पूछती - 'गाना सुनेंगे ?' जवाब मिले बगैर चालू ...
    :)
    आप मुझसे एक दम उलट थीं , मेरे मुंह से तो आवाज ही नहीं निकलती | :D

    सादर

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