बुधवार, 13 जुलाई 2011

जहाँ गई नज़रें , भाव उमड़े (निलेश माथुर)



निलेश माथुर , ब्लॉग - http://mathurnilesh.blogspot.com/ , मुझे इस ब्लॉग से मिलना बहुत अच्छा लगा . रोज़मर्रा की जुड़ी चीजें .... निलेश जी ने सबको शब्द दिए ... फूलदान, मेरी कमीज ,मेरी पतलून ,मेरा जूता, मेरा ट्रांजिस्टर, ..... आपने पढ़ा है ? इसे कहते हैं , जहाँ गई नज़रें , भाव उमड़े और शब्दों ने उनको जीवंत कर दिया . चलिए एक पढ़वा ही दूँ , जिसने नहीं पढ़ा हो , वे भी मेरी तरह मिलकर खुश हो जाएँ - http://mathurnilesh.blogspot.com/2010/04/blog-post_21.html .
मैं आज भी उनको नियम से पढ़ती हूँ , पर ब्लॉग पर जाने से पहले ये सारे प्रसंग मुझे याद आ जाते हैं और धीरे से मैं ढूंढती हूँ - कमरे का आईना , रेत के कण, बारिश की बूंदें , बेतरतीब ज़िन्दगी, सोचती ज़िन्दगी .......

परिचय लिखने से पूर्व मैंने हर शख्स का परिचय पढ़ा , निलेश जी ने जब दीदी संबोधन के साथ अपना परिचय मुझे दिया तो इस संबोधन ने तो मुझे अभिभूत किया ही , निलेश जी के सच ने मुझे सुकून दिया .... सच कहने का साहस तो दूर की बात है, मन से भी कोई स्वीकार कर ले तो बड़ी बात है . निलेश जी ने परिचय भेजते हुए लिखा - दीदी, मेरी बचपन से अब तक की यात्रा शायद आपको अच्छी नहीं लगेगी लेकिन संक्षेप में सब सच सच लिख रहा हूँ ! इस सच ने निलेश जी को मेरी नज़रों में और ऊँचा कर दिया
. मैंने अपनी ज़िन्दगी में सच का सम्मान किया है . इस सच के निकट अपनी माँ (श्रीमती सरस्वती प्रसाद ) की लिखित पंक्तियाँ याद आ गईं -

'दर्द मेरे गान बन जा
सुन जिसे धरती की छाती हिल पड़े
वज्र सा निर्मम जगत ये खिल पड़े
लाज रखकर ह्रदय की ऊँची इमारत का
मेरा सम्मान बन जा
दर्द मेरे गान बन जा ....'

आइये निलेश जी के सच से मिलिए -

पिता जी गांधीवादी अध्यापक थे और वो मुझे पढा लिखा कर डाक्टर इंजीनिअर कुछ बनाना चाहते थे, लेकिन मैं दोस्तों के साथ मिल कर शराब पीने और गुंडागर्दी करने में ही लगा रहता था, और बहुत पैसे कमाने का भूत भी सवार था, कभी कभी सोचता था कि मुंबई जा कर डी कंपनी में भर्ती हो जाऊ, पिता जी को सब जगह मेरी वजह से शर्मिंदा होना पड़ता था, कभी कभी गुस्से में वो मेरी पिटाई भी कर देते थे, एक बार मैंने एक दुकान में तोड़फोड़ कर दी, मुझे पता नहीं था कि दुकान का मालिक मेरे पिता जी का परिचित है, जब उसने मुझसे ये कहा तो मैं बहुत शर्मिंदा हुआ, इसी तरह दिन बीतते रहे, इस बीच मेरे कुछ दोस्त जेल की हवा खा रहे थे, मैं किस्मत से बचा हुआ था, पिता जी मुझसे परेशान मैं उनसे परेशान, इसी बीच मेरे मामा जी जो गुवाहाटी में रहते हैं वो मुझे बोले कि मेरे साथ गुवाहाटी चलो तब मैंने सोचा यहाँ रहकर मैं कुछ कर नहीं पाउँगा और मैं गुवाहाटी चला आया, जिस समय हम अपने नौकर को 1000 रूपया तनख्वाह देते थे मैंने यहाँ आ कर 800 रुपये महीने में सुरुआत की और 6 साल नौकरी की 6 साल बाद मेरी तनख्वाह थी 4000 रुपये, बांस के बने घर में बहुत दिन रहा सालों कुँए पर नहाया, जिद्दी तो शुरू से था 1997 में एक छोटी सी बात पर गुस्सा हो कर काम छोड़ कर चल दिया, एक पैसा जेब में नहीं था, अपने घर वालों को मैंने कभी अपनी ये स्थिति नहीं बताई, मैं नहीं चाहता था की मेरे लिए वो लोग चिंतित हों, दोस्तों से उधार ले कर किसी तरह 6-8 महीने बिताये और वो जीवन का बहुत ही बुरा वक़्त था, मेरे एक घनिष्ठ जो कि बहुत पैसे वाले थे उन्होंने उस समय मुझे 2000 रुपये उधार देने से मना कर दिया था, ये अलग बात है कि आज वो दस लाख भी देने को तैयार हैं, लेकिन फिर धीरे धीरे छोटा मोटा व्यवसाय करने लगा, जीवन में बहुत संघर्ष किया लेकिन आज इस लायक बन चुका हूँ कि अपना घर परिवार ठीक से चला रहा हूँ, और किसी भी ज़रूरतमंद के लिए सदा हाज़िर रहता हूँ, वो कहते हैं ना कि जिस पेड़ की जड़ें मजबूत होती है वो तूफ़ान में भी डटा रहता है, तो मेरी भी जड़ें शायद मजबूत हैं और संस्कारों ने मुझे कभी गिरने नहीं दिया, वक़्त के साथ साथ सोच बदलती गयी, अब सिर्फ एक अच्छा इंसान बनने की कोशिश में हूँ, लिखने का शौक तो बचपन से ही था, थोड़े बहुत गुण पिता से भी तो आते हैं!


ख्वाब देखने में

और जीने की जद्दोजहद में
कब बीत गयी ज़िन्दगी
पता ही ना चला,

अब वक़्त बहुत कम है
और काम ज्यादा
काम मतलब किताबें
जो पढनी बाकी हैं,

और हंसना और हंसाना भी तो है

जो कि अब तक मैं नहीं कर पाया! .....

32 टिप्‍पणियां:

  1. निलेश जी की कुछ एक रचनाएँ पढ़ीं हैं.जीवन से सीधा सरोकार दिखाई पढता है उनमें.आज उसका राज भी उनके परिचय से समझ में आ गया.गिर कर जो उठ सके वही सही मायनो में जिंदगी जीना जनता है.
    रश्मि जी आपका आभार इस खूबसूरत श्रृंखला के लिए.

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  2. निलेश जी को इस तरह पढना मन को छू गया ...आँखे नम है और बहुत कुछ यादो में है ...जो फिर ताज़ा हो गया .............आभार आपका दीदी निलेश जी को इतने करीब से जानने के लिए

    anu

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  3. आज नीलेश जी का परिचय पाकर उनसे मिलकर अच्छा लगा………एक ईमानदार सोच का व्यक्ति ही ज़िन्दगी मे सफ़लता की सीढियाँ तय कर मंज़िल तक पहुँच पाता है…………आगे की ज़िन्दगी के लिये हार्दिक शुभकामनायें।

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  4. परिचय बहुत साफगोई से भरा पूरा . आभार .

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  5. वह सच कितना भी कटु क्‍यों न हो ...आप उसे बेहद मान देती हैं ये आपकी रचनाओं में तो अक्‍सर नजर आता है ..आज परिचय की इस कड़ी में निलेश जी के सच को आपने कितने ससम्‍मान यहां अपने शब्‍दों में उतारा है मन श्रद्धान्‍वत हो उठा है, निलेश जी को पढ़ना अभी बाकी है पर जितना भी आपके माध्‍यम से जाना बहुत ही अच्‍छा लगा ...उनकी सफलता के लिये बधाई एवं शुभकामनाएं आपका आभार इस प्रस्‍तुति के लिये ।

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  6. बहुत अच्छा लगा निलेश जी के बारे में जान कर.. मैंने आज ही उनके ब्लॉग पर गयी और उनकी बहुत सारी रचना पढ़ी... सभी रचनाये जीवन के हर पहलु को दर्शाती है.. बहुत ही अच्छा लगा... आपको बहुत बहुत धन्यवाद की अपने निलेश जी का परिचय हम सभी से कराया....

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  7. निलेश जी की ईमानदारी उनके शब्दों से बया हो रही है ..जितने दिन किस्मत की मार थी ..झेल ली ..अब राह सुगम है ..आज पहली बार परिचय हुआ है..अब जरुर उनको पढ़ना चाहूंगी ....?

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  8. Sach hamesha JItta hi hai ... sach ki sweekroti harek ke bas main nahi... HAts of U Nilesh bhai...!

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  9. जीवन की सच्चाई को स्पष्टवादिता से स्वीकार करना,उनकी चारित्रिक द्रढता का परिचायक है. नीलेश जी की स्पष्ट स्वीकारोक्ति काबिले तारीफ़ है..हार्दिक शुभकामनायें !

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  10. नीलेश जी का परिचय पाकर उनसे मिलकर अच्छा लगा....आपको बहुत बहुत धन्यवाद की अपने निलेश जी का परिचय हम सभी से कराया...निलेश जी की आगे की ज़िन्दगी के लिये हार्दिक शुभकामनायें।

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  11. दीदी, आप सब ने जो स्नेह और सम्मान दिया है पढ़कर आँखें नम हो गयी और बहुत भावुक हो गया हूँ, आप सभी का धन्यवाद्, चाहता हूँ कि आप सब का स्नेह और आशीर्वाद इसी तरह जीवन में मिलता रहे.

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  12. बेहतरीन मुलाक़ात और अच्छा अंदाज़

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  13. मेरे छोटे भाई हैं!
    इनकी कविताओं, आत्माभिव्यक्ति एवं स्वीकारोक्ति से इनके जीवन की इन घटनाओं का आभास था मुझे और यह भी कि इनके ह्रदय में पश्चाताप भी है.. सच्चे आंसुओं का गंगाजल हर कालिख धो देता है और इसी का उदाहरण है नीलेश जी!!

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  14. अरे वाह ! आभार आपका जो आपने नीलेश को, अपने ब्लॉग पर प्रमुखता दी !

    बहुत कम लोग हैं, यहाँ जो संवेदनशील हैं, आडम्बर और गर्व रहित नीलेश की हर रचना से, अपनापन और स्नेह झलकता है !
    दूसरों की व्यथा को अपने दिल से जोड़कर शब्द चित्रण करना, नीलेश की विशेषता रही है !

    वाकई रश्मि जी आपका यह "आवारा बादल " भाई बनाने के सम्पूर्ण योग्य है !

    आपको बधाई और नीलेश को शुभकामनायें !

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  15. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  16. कुछ कुछ जाने पहचाने से लगते हैं

    ऐसे बेगाने कि अपने से लगते हैं।

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  17. नीलेश जी का परिचय और आपकी कलम दोनो ने एकदम सच कहा है ... बहुत ही अच्‍छा लगा पढ़कर ..आभार के साथ शुभकामनाएं ।

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  18. "रोज़मर्रा की जुड़ी चीजें .... निलेश जी ने सबको शब्द दिए ... "
    रश्मि दी बिलकुल सही लिखें है आपने निलेश जी के लिए ये शब्द..
    बहुत अच्छा लगा निलेश जी को इतने करीब जान कर...आभार के साथ आप दोनों को असीम शुभकामनाएं.....

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  19. बहुत बढिया। नीलेश जी से मिलकर अच्छा लगा।

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  20. सच कहा आपने...इतनी साफगोई से शायद ही कोई अपने बारे में बताता है...

    बड़ा ही अच्छा लगा व्यक्तित्व परिचय...

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  21. पात्र परिचय के लिए आपका आभार .निलेश जी से मिलने चले .राम राम .

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  22. निलेश जी पढना मन को छू गया ............आभार आपका निलेश जी को इतने करीब से जानने के लिए

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  23. ये भी खूब रहा नीलेश को जानने को... :)

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  24. ख्वाब देखने में
    और जीने की जद्दोजहद में
    कब बीत गयी ज़िन्दगी
    पता ही ना चला,

    सुन्दर और ईमानदार प्रस्तुति !!

    ज़िंदगी का सच... अभी अभी तो चलना शुरू किया था और ये क्या.. कब ज़माने गुजर गए पता भी न चला..

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  25. नीलेश जी की इस अदभुत जीवन यात्रा को पढ कर उनके लिये एक आदर भाव जाग गया । जीवन को सही पटरी पर लाना बडी कठिन बात है खास कर जब आप भटक गये हों उनकी कविताएँ भी अच्छी लगीं । उनके ब्लॉग पर जाउँगी कभी ।

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  26. नीलेश जी आपका परिचय पढ़ा या यूँ कहें कि जिन्दगी कि सच्चाई से रूबरू हुए ................कुछ बातें अभी तक सुलझी नहीं .........वो ये कि आप का परिमार्जित रूप के दर्शन आपके पिता जी को हुए या नहीं ............क्यूंकि अब तो आप भी पिता होंगे और महसूस कर पाते होंगे उनके दुःख को ...पूत कपूत हो तो उससे बड़ा कष्ट कुछ और नहीं होता माँ -बाप को ..............चलिए देर आयद दुरुस्त आयद .......बधाई आपको कि अब आप एक अच्छे इंसान बन गए हैं ...........

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  27. @नीलम जी,
    धन्यवाद आपका, मैंने अपने पिता जी को एक अच्छा बेटा बन कर दिखाया है लेकिन मेरा संघर्ष आज भी उन लोगों से छुपा हुआ ही है, बताने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई। अपना स्नेह और आशीर्वाद बनाए रखिएगा।

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  28. बड़ा ही अच्छा लगा व्यक्तित्व परिचय... आपका परिचय नीलेश जी

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  29. नीलेश जी salute है आपको और आपकी इमानदारी को |

    हौंसलों के धुंधले निशान अभी बाकी हैं ,
    उम्मीदों के दरकते कुछ मकान अभी बाकी हैं ,
    ढलान अभी बाकी हैं रातों में बेशक ,
    छूने को फिर भी सातों आसमान अभी बाकी हैं |

    सादर

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