शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

अनकहा कहा - मीनाक्षी धन्वन्तरी

(नोट - अस्वस्थता की वजह से मेरी कलम रुक गई थी , अभी भी मध्यांतर का आलम होगा .... पर कलम चलेगी )


कितना कुछ अनकहा कहा होता है , जो कभी पत्तियों से ओस बन सरकता है , कभी चिड़ियों की उड़ान में गगन का विस्तार नापता है , कभी किसी की सिसकी में अपनी ज़िन्दगी के इक लम्हें को पाता है , कभी सन्नाटे में एक मुस्कान रख देता है , फिर अचानक बिल्कुल अचानक अपनी डायरी के पन्नों में उसे समेट बन्द कर देता है उस कमरे में - जहाँ हर ताखे पर यादों की एक सिहरती पोटली होती है ....... ऐसा ही लगा जब अपनी यात्रा के दौरान मैं मीनाक्षी जी के ब्लॉग http://meenakshi-meenu.blogspot.com/ पर रुकी ..... उनकी रचना ' मेरे पास एक लम्हा है ' एक लम्हें की मानिंद मेरी दोस्त बन गई ... हर एक कदम पर महसूस हुआ , यह पहचान आज की नहीं ... कुछ है जो दोनों के मध्य सरस्वती की तरह प्रवाहित है .

कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते हैं , दो आँखें होती हैं - जिनसे आंसू अनजाने छलक उठते हैं , दो पाँव होते हैं - जिनके छालों से रास्तों की पहचान मिलती है , और होती है एक सहज मुस्कान जिसकी व्याख्या नहीं होती ...

चलिए अनकहे कहे से कुछ सुनें -

कितने दिनों से टलता आ रहा सीधा सादा सा परिचय आज कुछ हिम्मत करके एक कदम आगे बढ़ा ....यह सोच कर कि रश्मिजी की क़लम राह चलते चलते अपने हुनर से उसे सँवार ही देगी....
“जब से होश सँभाला प्रेम को ही सत्य माना...इसलिए ब्लॉग का नाम भी रखा ‘प्रेम ही सत्य है’” बचपन से ही प्रकृति और मानव में एक दूसरे की छाया मन को आकर्षित करती...वही जाने अंजाने लेखन में झलक जाता..इसी से जुड़ी एक घटना का ज़िक्र ज़रूरी लगता है...सातवीं कक्षा में हिन्दी टीचर ने प्रात:काल पर एक लेख लिखने को कहा...चहचहाती चिड़ियाँ लगी थीं देश के भूखे बच्चे जो रोते हैं एक निवाले के लिए...या शायद बिन माँ के बच्चे माँ के आँचल के लिए... बस फिर क्या था फौरन मम्मी डैडी की पेशी हुई कि शायद घर में कुछ अनहोनी न हुई हो...उसके बाद से लेखन जारी रहा लेकिन डायरी के पन्नों में कैद रहा...मुक्त हुआ तो 2007 में..डायरी के पन्नों से उतरा ब्लॉग़ पर....
अपने जीवन के बारे में क्या कहूँ...आम जीवन है लेकिन खास भी है....जिससे हर पल कुछ न कुछ नया सीखा... जन्म लेते ही दादी के रोने का सबब बनी लेकिन डैडी ने गोद में लेते ही कहा कि यह तो मेरी मीठी मधु है...बहेगी हमारे घर में महकती हुई मधु की धार और फिर छोटी बहन बेला भी आ गई.....दोनो बहनें जहाँ मम्मी डैडी और ननिहाल की लाडली थीं वहीं ददिहाल में एक आँख न देखी जातीं...फिर भी हमें दादी बहुत प्यारी लगतीं... शायद मम्मी के संस्कार थे जिन्होंने दादी की झिड़की को भी प्यार समझने की नसीहत दी.
ग्यारह साल की हुई तो घर में नन्हा सा चाँद उतरा....सबकी आँखों का तारा खासकर मम्मी डैडी के लिए तो वह तोता था जिसमें उनकी जान बसती फिर भी हम दोनों को कभी न लगता कि तीनों में कोई भेदभाव किया जाता है... सब को बराबर का प्यार और दुलार मिलता....शायद उसी कारण तीनों भाई बहन आज तक एक दूसरे के लिए कुछ भी करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं...
लड़की लड़के कोई भेदभाव ही नहीं था...कोई रोक टोक नही थी... इसलिए शायद आज़ादी मिलने पर भी उसका कभी फायदा नहीं उठाया हाँ मस्ती ज़रूर की...गर्मी की जिन छुट्टियों में ननिहाल या कुल्लू मौसी के पास न जा पाते तब मुझे अकेले ही जहाँ मैं जाना चाहती भेज दिया जाता...आठवीं में पहली बार अम्बाला अकेली गई थी...आज भी याद है जब बस से उतर कर घर जाने के लिए रिक्शे वाले का चेहरा पढ़कर रिक्शे पर बैठी थी...फिर भी सतर्क थी कि अगर वह किसी गलत गली में मुड़ा तो उसके सिर पर ब्रीफकेस दे मारूँगी...दसवीं के बाद अकेले कश्मीर जाने का अनुभव तो और भी दिलचस्प था...
दिल्ली में जन्मी पली-बढ़ी...स्कूल और कॉलेज खत्म हुआ तो.....बस यहीं ज़िन्दगी कुछ अटक गई या बहक गई...चार साल तक आवारा मस्त हवा की तरह बिना किसी लक्ष्य के बहती रही..... अपने मौसेरे भाई के ऑफिस में एक साल रिसेप्शनिस्ट की नौकरी की जहाँ मौसी से बहुत कुछ सीखा...उनकी एक बात को आज तक गाँठ बाँध कर रखा है.....”अपेक्षाओं की अति हमेशा दुख देती हैं... चाहे वे अपने से हों या अपनों से” उसके बाद पत्राचार से हिन्दी में एम.ए. किया.... उस दौरान जाना कि भाषाएँ जीवन में कितना महत्व रखती हैं...भाषाएँ भावनाओं को पुष्ट करती हैं... एक अच्छा डॉक्टर या इंजिनियर बनने के लिए अगर उनसे जुड़े विषय पढ़ने जरूरी होते हैं तो भाषा एक अच्छा इंसान बनाने में मदद करती है...और फिर एक अच्छा इंसान ही जीवन में आगे बढ़ सकता है......
अपनी सुरक्षा के लिए जूडो कराटे सीखने के लिए भेजा गया...उस कला का सही वक्त पर इस्तेमाल हो इसके लिए योग करने मानतलाई गई....मम्मी को मेरी लक्ष्यहीन ज़िन्दगी पसन्द नहीं थी, वे चाहती थीं कि अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए कुछ करूँ... इधर डैडी की शय पाकर मैं अपने में मस्त बेफिक्र जीती रही....समाज और परिवार की तरफ से इशारा मिलते ही उस मस्ती पर रोक लगानी पड़ी...कानून और राजनिति की पढ़ाई बीच में ही छूट गई और शादी हो गई.....
ज़िन्दगी का आधा शतक पार करने पर बैठी सोच रही हूँ कि जितना विश्वास और आज़ादी का वातावरण माता-पिता के घर था उससे कहीं ज़्यादा पति के घर में पाया.....शादी के बाद रियाद आकर ज़िन्दगी ने नई करवट ली....दोनों बेटों के साथ हमने भी स्कूल में दाख़िला ले लिया हिन्दी अध्यापिका के रूप में....उस वक्त का वह निर्णय मेरी ज़िन्दगी का बेहतरीन फैंसला था..... ज़िन्दगी मेरी गुरु थी उसी के अनुभवों को बाँटने लगी स्कूल के बच्चों में...
जहाँ तक लेखन की बात है वह तो बचपन से साथ था जो अब तक है...रियाद और दुबई में पढ़ाते हुए डायरी, लेख, कविता और कहानी ने एक नया रूप पाया छोटे छोटे एकांकी और नाटकों के रूप में...बच्चों के साथ लिखना पढ़ना और भी बढ़ गया...स्कूल मेग्ज़ीन में हिन्दी सम्पादन के दौरान बच्चों की हिन्दी में लिखी रचनाएँ मन खुश कर देतीं...स्कूल कॉलेज के कई बच्चे आज भी हिन्दी सीखना पढ़ना चाहते हैं,,,गीत गज़ल और नाटक का मंचन करना चाहते हैं लेकिन......... इस लेकिन का जवाब आपको ढूँढना है...!!

मेरा परिचय चाहा आपने इसका आभार

कोशिश करके देती हूँ इसे कुछ आकार...

न मैं रचनाकार नामी, न कोई साहित्यकार

हूँ बस एक आम साधारण सी चिट्ठाकार ...

जो भी है सब कुछ है अपना घर परिवार

होती हैं इनमें छोटी छोटी खुशियाँ साकार ....

चिट्ठा ‘प्रेम ही सत्य’ करता सबका सत्कार

स्वागत करता, नहीं किसी को देता दुत्कार

सरल सहज सा लिखती, हूँ ऐसी कर्मकार

है मेरा लेखन सादा, है सादा ही व्यवहार

यहाँ सभी हैं एक से बढ़कर एक कलाकार

उन सभी को मेरा प्यार भरा नमस्कार


20 टिप्‍पणियां:

  1. मीनाक्षी ,आज तुम्हारे बारे में थोड़ा और जान पायी .... ये और जानना और भी अच्छा लगा :)...... जिसको तुम आम साधारण सी कहती हो यही तुम्हारी असाधारणता है .......

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  2. आपकी कलम ने आज फिर एक ऐसी शख्सियत से मिलाया जिन्‍हें पढ़कर न जाने कितने दृष्‍य चलायमान हो गये ..बचपन के कुछ सीखने के सिखाने के ...इस असाधारण प्रतिभा को बधाई के साथ शुभकामनाएं आपका आभार ।

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  3. बहुत कुछ नया जाना आपके बारे में मीनाक्षी जी ..आपसे मिलना बहुत ही सुखद यादगार अनुभव है मेरी ज़िन्दगी का ..

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  4. मीनाक्षी दी ,
    आप से बहुत हौसला मिला था कभी ,वो आपको भी नहीं पता है ,आज आपके बारे में जाना और पढ़ा या ये कहे, कि महसूस किया
    शुभकामनाये आपको

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  5. MEENAKSHI JI KE BARE ME JAANKAR ACHCHA LAGA AAJ PAHLI PAR UNKE JEEVAN KE ANCHHUYE PAHLUON SE RU-B-RU HONE KA MAUKA MILA............ASADHARAN PRATIBHA KI DHANI HAIN.

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  6. हम सब एक दूसरे को कुछ तो जानते ही हैं लेकिन रश्मि जी के इस सफर से एक दूसरे को बचपन से अब तक जानकर लगाने लगा है की हम तो बहुत दिनों से एक दूसरे को जानते रहे हैं. मीनाक्षी जी जल्दी से पूरी तरह से स्वस्थ होइए. फिर निर्बाध कलम की धार देखने कोमिले.

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  7. आपकी क़लम के आइने में अपनी शख़्सियत को देख कर खुद पर ही मोहित हो गए :)...जिसमें आपकी भावनाओं की महक है...
    @निवेदिता...@सदा...@रंजना....@नीलम..देखने परखने वाले के कारण ही कोई अपने को पहचान पाता है...आप सबका आभार...
    @नीलम..यकीनन पता नहीं है लेकिन हौंसला मिला यही जानकर बेहद खुशी हुई....

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  8. मेरा परिचय चाहा आपने इसका आभार
    कोशिश करके देती हूँ इसे कुछ आकार...
    न मैं रचनाकार नामी, न कोई साहित्यकार
    हूँ बस एक आम साधारण सी चिट्ठाकार ...आपको जानने के लिए आपकी रचना का सार पढ़ना ही बहुत है बहुत अच्छा लगा आपसे मिलकर दोस्त :)

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  9. आपकी कलम से मीनाक्षी जी का परिचय मिला ..इनका ब्लॉग तो पद्धति रहती हूँ पर आज विस्तार से परिचय मिला ..आभार

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  10. मीनाक्षी, आपको पढ़ना और जानना बहुत सुखद लगा...धन्यवाद ....

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  11. मीनाक्षी जी के बारे में इस तरह जानना अच्छा लगा...बेहतरीन शक्सियत से परिचय कराने का आभार...

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  12. रश्मिजी
    मीनाक्षी जी को आपके द्वारा जानना बहुत ही सुखद लगा \
    आज अपने ही लोग अपनों से दूर होते जा रहे है ऐसे में मीनाक्षी जी को जानना अपनापन दे गया \
    आपके स्वास्थ की शुभकामनाओ के साथ आभार |

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  13. बहुत अच्छा लगा मीनाक्षी के बारे में यहाँ पढ़ कर। टिप्पणियाँ पढ़ कर और भी प्रसन्नता हुई। आपके बारे में ऐसे ही पढ़ने को मिलता रहे, बहुत बधाई।

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  14. Minakshi ji se parichay aur unke baare bhi jaankari sab tak pahunchne ka sarhnaiya aur anukarniya prayas bahut achha laga.. iske liye aabhar!
    Aap hamesha swasth rahen aur yun hi hindi sahitya ko smradh karte rahen yahi meri mangalkaman hai..
    sadar!

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  15. meenakshi jee...ek behatreeen sakhsiyat...:)
    achchha laga padh kar, thora bahut interaction to pahle se tha............par padh kar jana ki kyon ye shaksiyat itna pyara hai:)

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  16. .”अपेक्षाओं की अति हमेशा दुख देती हैं... चाहे वे अपने से हों या अपनों से” कितनी गूढ़ बात कही है...मीनाक्षी जी से बातें करो तो ऐसी ही प्रेरक बातें अनायास ही सुनने को मिल जाती हैं...


    बहुत ही जीवट वाली...जिंदादिल और संवेदनशील महिला हैं...उन्हें इस तरह से जानना बहुत अच्छा लगा...आभार

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  17. अपेक्षाएं हमेशा ही दुखी करती है , क्या शक है !
    बहुत अच्छा लगा मीनाक्षी जी से यूँ मिलना भी !

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  18. लेकिन.......आप इसे संभव बना सकती हैं।
    बहुत अच्छा लगा मीनक्षी जी और इनके ब्लॉग के बारे मे जानकार।

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  19. मीनाक्षी जी आपको जानना बहुत सुखद लगा

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  20. मीनाक्षी जी का परिचय पढ़ा , आखिरी की चंद पंक्तियाँ पूरा संक्षिप्त परिचय हैं |

    सादर

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